The Kite Runner

Keywords: #afghanistan #book-review #fiction #khaled-hosseini
Finished reading this book around a month ago, it was hard to put it down. And it was equally hard to write a review without putting too much details of the story, which would inadvertently creep in. Mostly because it grasped me emotionally, and only after a month or so, this is my third attempt to write a short review. Story set in 1970s Kabul, narrator Amir comes from a rich family, he lives with his father (Baba) in his house.

ग़ज़ल - फ़ैसले का वक़्त

Keywords: #ghazal #mypoetry #shayari
फ़ैसले का वक़्त तो कल पर ही टलता रह गया दुनिया के साँचे में मैं चुपचाप ढलता रह गया खिड़कियों से छन के आती धूप से जागा हुआ *ख़्वाबीदा आँखों को अपनी मैं मसलता रह गया उठ के महफ़िल से मेरी सब यार अपने घर गए एक अकेला मैं दिये के साथ जलता रह गया क्यों *किताब-ए-माज़ी को ले कर मैं बारिश में रहा *हर्फ़ सारे मिट गए बस एक धुँधलका रह गया

Wings of Fire

Keywords: #apj-abdul-kalam #autobiography #book-review
Started my journey of reading non-fiction and autobiographical books with this gem. Finished reading it today, and coincidentally it’s author’s birthday. The author is a person that every Indian is well aware of, as the former President of India, and as the “missile man of India”. After reading this book I came to a realisation that there words fall short to describe his contribution to our country in the field of defense and space science.

अनपढ़

Keywords: #hindi #mypoetry #poem
पढ़ चुका हूँ हिंदी, अंग्रेजी और गणित पढ़ा है भौतिकी, भूगोल और इतिहास लेकिन वैसे ही, जैसे दीमक पढ़ते हैं गोया कि, मुझे मालूम है भौतिकी के नियम स्थूल और सुक्ष्म वस्तुओं के लिए भिन्न हैं पर यह नहीं जानता कि भौतिकी के नियम प्रेम पर भी लागू होते हैं जो इन दोनों से परे है पढ़े हैं भाषा और व्याकरण के नियम पर यह नहीं समझ पाया कि दुलार और फटकार में याचक की भाषा

होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने

Keywords: #article #ghalib #shayari
आज 27 दिसंबर, बहुत लोगों के लिए आम सा दिन है…मगर जो शख्स शायरी से ताल्लुक़ रखते हैं उनके लिए आज का दिन बेहद खास है। आज है भारत में जन्मे सबसे मक़बूल और महान शायर, मिर्ज़ा ग़ालिब की यौम-ए-पैदाइश! ग़ालिब का जन्म 1797 में आगरा में हुआ, बचपन में ही सर से बाप का साया उठ जाने के बाद दिल्ली जाना हुआ, जहाँ इनकी ज़िन्दगी का एक बड़ा दौर गुज़रा। शायरी का हुनर ख़ुदा से माँग कर आये थे, सो 11 की उम्र से ही ग़ज़लें कहना शुरू कर दीं।